मैं एक कहानी हूँ,
जो कभी कही नहीं गई,
सपनों के कोनों में छिपी,
धूल भरी लाइब्रेरी की तरह
मेरी पंक्तियाँ हवा में लटकीं रहीं,
अनसुलझे धागों सी,
कभी मुस्काती, कभी आँसुओं से भीगी, पर बोली कभी नहीं
मेरे अंदर शहर हैं,
जो नक्शे पर नहीं मिलते,
नदियाँ जो बहतीं वो सागर को निगल जातीं
प्रेम की वो चिंगारियाँ,
जो आग न बन सकीं,
और दर्द के वो पहाड़,
जो चुपचाप सहते रहे
अश्रु नीर की बारिश
मैं हूँ वो पत्र, जो लिखा तो गया
पर भेजा न गया,
वो गीत, जो गुनगुनाया
तक नहीं गया
रातों की चादर में लिपटी, तारों से बातें करती,
पर सुबह की धूप में विलीन,
बिना नाम के
कभी कोई कान मिले, जो मेरी साँसें सुन ले,
तो फूट पड़ूंगी मैं,
बाढ़ की तरह,
अनगिनत लहरों में।
पर तब तक, मैं रहूँगी यहीं, छाया सी,
एक कहानी, जो कभी कही नहीं गई।
आखिरी उम्मीद बस
तुम्हारी कलम, शायद अब बोलेगी...
©पुलिन त्रिपाठी