तेरी यादों से सजी, बड़ी रंगीन थी
तुम्हारे अक्स से रौशन था मेरा कमरा भी,
मगर जो सुब्ह हुई वो, बड़ी ग़मगीन थी
तलाशता रहा तुमको मैं दिन के शोर में भी,
मेरे वजूद से खिसकी हुई ज़मीन थी
ये हिज्र का जो सलीक़ा सिखा गए हो तुम,
तुम्हारी ये इनायत भी, बड़ी संगीन थी
अजब सी कशमकश में कट गई ये उम्र अपनी,
न पूरा दर्द मिला, न कोई तस्कीन थी
© पुलिन त्रिपाठी
