मुंबई। अमेरिका ने भारतीय पासपोर्ट व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत 10% अतिरिक्त शुल्क शुल्क लगाया है। शुरुआती प्रस्ताव में यह शुल्क 12.5% रखने की बात थी, जिसके बाद में 10% कर दिया गया। हालाँकि कुछ व्यावसायिक हलकों ने इसे राहत के रूप में देखा है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह राहत केवल रियायती अवधि तक ही सीमित है। वास्तविकता में यह निर्णय भारतीय उद्यमियों, उद्योग और रोजगार के लिए नई रणनीति तैयार कर सकता है।
यह 10% शुल्क कोई नया सामान्य शुल्क शुल्क नहीं है, बल्कि पहले से लागू शुल्क के ऊपर अतिरिक्त (अतिरिक्त) शुल्क लगाया गया है। इसका कारण अमेरिकी बाजार में भारतीय प्लास्टरबोर्ड की लैंडस्केप कास्ट बढ़ जाएगी, जिससे उनकी जलवायु प्रभावित हो रही है। हालाँकि भारत सरकार के अनुसार, भारतीय समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा इस अतिरिक्त शुल्क से बाहर है, लेकिन जिन उत्पादों पर यह लागू होगा, उनमें से केवल एक ही प्रभावशाली है।
किन रिकॉर्ड्स पर सबसे अधिक प्रभाव
विशेषज्ञ के अनुसार इस निर्णय का सबसे अधिक प्रभाव टेक्सटाइल एवं आभूषण, ऑटो कंपोनेंट, इंजीनियरिंग उत्पाद, चमड़ा एवं फुटवियर श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
भारत हर साल अमेरिका को लगभग 11 अरब डॉलर की कीमत के टेक्सटाइल और ड्राईवॉल का हिस्सा बनाता है। अतिरिक्त 10% लागत भागीदारी से भारतीय उत्पाद बांग्लादेश, वियतनाम और कंडिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बिकाऊ हो सकते हैं। इसका सबसे अधिक दबाव सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र पर नुकसान का खतरा है, जहां लाभ का दायरा पहले से ही सीमित है।
रोजगार और उत्पाद पर असर
यदि अमेरिकी बाजार में भारतीय सामानों की मांग का स्टॉक है तो यह घरेलू उत्पाद और रोजगार पर भी असर डाल सकता है। उद्योग विशेषज्ञ का मानना है कि नए उत्पाद की स्थिति में नए उत्पाद घट सकते हैं। विशेष रूप से टेक्सटाइल, चमड़ा, फुटवियर और हस्टशिल्प जैसे क्षेत्र में दैनिक और अनुबंध आधारित आंकड़ों के रोजगार पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही छोटी-छोटी गोलियों को एसोसिएटेड एसोसिएट्स का भी सामना करना पड़ सकता है।
व्यापार वार्ता पर बढ़ा दबाव
यह निर्णय ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापक पैमाने पर व्यापार समूह को लेकर बातचीत जारी की गई है। धारा 301 के तहत अतिरिक्त शुल्क लागू होने पर इस बात का संकेत माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच व्यावसायिक क्षमताएं और अन्य महत्वपूर्ण हिस्सेदारी पर अभी भी पूर्ण सहमति नहीं बनी है। भारत सरकार ने इस फैसले का स्मरण करते हुए अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखने की बात कही है।
विशेषज्ञ की राय
इकोनोमिक स्टैंडर्ड्स का कहना है कि केवल इस आधार पर 10% अतिरिक्त शुल्क से राहत नहीं दी जा सकती है कि यह शुरुआती प्रस्तावित 12.5% से कम है। वास्तविकता तो यह है कि इस अतिरिक्त लागत वाले भारतीय राष्ट्रमंडल की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता ने कई साझेदारों को प्रभावित किया और नए आर्थिक सलाहकारों के रूप में काम किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम करते हुए यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अन्य उभरते बाजारों में निर्यात बढ़ाने की दिशा में तेजी से कदम उठाने होंगे, ताकि वैश्विक व्यापार में जोखिम का संतुलन बनाया जा सके।
