मैं एक कहानी हूँ,
जो अब चुप न रहूंगी,
स्वप्न के नवीनतम से सारांश,
धूल झाड़कर,
दास पर उतर आओगी
मेरी कतारें हवा में न लटकेंगी अब,
धागों को सेटकर बुनूंगी शाल,
मुस्कान की चमक से जगमगती,
आंसुओं को मोती बनाऊँगा,
और बोलूंगी—जोर से, बिना विश्राम
मेरे शहर के अंदर हैं,
जो अब आर्किटेक्चर रचेंगे खुद,
नदियाँ जो सागर को डिज़ाइन नहीं करेंगी,
बल्कि उसे गले लगाओगी नई राहें,
प्रेम की चिंगारियाँ अब आग लगेंगी,
डूबती रातें उतरीं जलाले,
और दर्द के पहाड़ ढांगे धड़ाके से,
अश्रु नीर की बारिश में खिलेंगे इंद्रधनुष
मैं हूं वो पत्र,
जो अब फ्लाइट भरेगा
हवा पर सवार,
वो गीत, जो गूंजेगा दोस्तों में,
रातों की नक्षत्र
निर्णय लेने के लिए साक्षत्कार,
सुबह की धूप में चमकेगी चमक,
नाम से साजी, पहचानने वाली।
कान मिले हैं अब, जो सांस लेंगे निगल लेंगे,
फूट-फूट मैं, भूख बढ़ना,
लहरों में उछलती, लहरों में उछलती,
अनगिनत किस्सों को बहा लाती
नहीं रहूंगी छाया सी अब,
एक कहानी, जो कही गई हर जंहा पर,
नमूना कलम ने मुझे प्यार किया,
पर अब भी मैं हूँ—जिंदा, श्वासोच्छवास,
हर दिल में बसने वाली, अनकही न रहने वाली
आखिरी उम्मीद न रही,
क्योंकि अब तो मैं हूँ—कही गयी कहानी,
तेरह आवाज़ों में, अनंत तक
अगर अब भी तुम चुप रहे
जला दूंगी
कागज़
कलम और
दवात
© पुलिन त्रिपाठी